शून्य को समर्पित
शून्य से प्रकट होता ब्रह्मांड — अस्तित्व, विज्ञान और आत्मबोध की दृष्टि से एक विस्तृत चिंतन जब हम आकाश की ओर देखते हैं, तो असंख्य तारे, ग्रह, आकाशगंगाएँ और अनंत विस्तार दिखाई देता है। परंतु एक गहन प्रश्न सदैव मन में उठता है — यह सब कहाँ से आया? क्या वास्तव में यह समस्त ब्रह्मांड किसी “शून्य” से प्रकट हुआ है? आध्यात्मिक परंपराएँ, अद्वैत वेदांत, बौद्ध दर्शन और आधुनिक विज्ञान — सभी अपने-अपने ढंग से इस रहस्य को समझाने का प्रयास करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि सभी कहीं न कहीं “शून्य” की ओर संकेत करते हैं। शून्य क्या है? सामान्यतः लोग शून्य का अर्थ “कुछ भी नहीं” समझते हैं। परंतु आध्यात्मिक दृष्टि में शून्य “खालीपन” नहीं, बल्कि अनंत संभावनाओं का मौन आधार है। यह वह अवस्था है— जहाँ कोई नाम नहीं, कोई रूप नहीं, कोई विचार नहीं, कोई समय नहीं, कोई सीमा नहीं। फिर भी उसी से सब कुछ उत्पन्न होता है। जिस प्रकार शांत महासागर से तरंगें उठती हैं, उसी प्रकार शून्य से ब्रह्मांड प्रकट होता है। विज्ञान की दृष्टि से शून्य आधुनिक विज्ञान के अनुसार ब्रह्मांड की शुरुआत एक अत्यंत सूक्ष्म अवस्था से हुई ज...