दोष देखने के कला
दोषदर्शी महात्मा कुछ लोग इस पृथ्वी पर एक विशेष मिशन लेकर आते हैं—दोष खोजने का मिशन। यदि भगवान भी स्वयं धरती पर आ जाएँ, तो ये विनम्रता से कहेंगे— "प्रभु! बाकी सब ठीक है, लेकिन आपकी योजना में कुछ सुधार की आवश्यकता है।" इनकी दृष्टि अद्भुत होती है। जहाँ साधारण मनुष्य फूल देखता है, वहाँ ये काँटे गिनते हैं। जहाँ कोई प्रेम देखता है, वहाँ ये स्वार्थ खोज लेते हैं। जहाँ कोई प्रयास देखता है, वहाँ ये केवल कमियाँ ढूँढ़ लेते हैं। यदि किसी ने सौ लोगों का भला किया हो और एक छोटी-सी भूल हो जाए, तो इनका कैमरा उसी भूल पर ज़ूम कर देता है। मानो संसार में अच्छाई का कोई मूल्य ही नहीं। ऐसे लोग घर में हों तो परिवार अशांत रहता है। कार्यालय में हों तो सहयोग कठिन हो जाता है। समाज में हों तो विभाजन बढ़ता है। और यदि यही वृत्ति अपने ही मन की ओर मुड़ जाए, तो व्यक्ति स्वयं से भी कभी संतुष्ट नहीं रह पाता। वास्तव में दोष देखने की आदत, दूसरों से अधिक देखने वाले को ही कष्ट देती है। क्योंकि संसार वैसा नहीं दिखता जैसा वह है, बल्कि वैसा दिखता है जैसा हमारा मन है। यदि मन में शिकायत भरी हो, तो चाँद में भी दाग ही दिखाई...