सहज सत्यबोध
मनुष्य सामान्यतः यह मानता है कि “मैं यह शरीर हूँ”, “मैं यह मन हूँ”, “मैं सोच रहा हूँ”, “मैं कर रहा हूँ”। लेकिन जब चेतना गहराई में उतरती है, तब एक अद्भुत अनुभूति प्रकट होती है — कि वास्तव में एक ही परम चेतना, एक ही ईश्वर, अनगिनत शरीरों, मनों और बुद्धियों के माध्यम से स्वयं को अनुभव कर रहा है। यह समझ केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि आत्मबोध की दिशा है। ईश्वर हर शरीर से स्वयं को कैसे अनुभव कर रहा है? जैसे एक ही सूर्य हजारों जल-पात्रों में अलग-अलग दिखाई देता है, वैसे ही एक ही चेतना अनगिनत जीवों में “मैं” के रूप में प्रकट हो रही है। सूर्य एक है… प्रतिबिंब अनेक हैं। चेतना एक है… शरीर अनेक हैं। जब आप कहते हैं “मैं हूँ”, और कोई दूसरा भी कहता है “मैं हूँ”, तो “मैं हूँ” की मूल अनुभूति एक ही है। अलग केवल नाम, रूप, व्यक्तित्व और स्मृतियाँ हैं। शरीर एक उपकरण है शरीर ईश्वर का एक माध्यम है, जिससे वह संसार को देखता, सुनता, छूता और अनुभव करता है। आपकी आँखों से वही देख रहा है… आपके कानों से वही सुन रहा है… आपके हृदय से वही प्रेम कर रहा है। इसीलिए उपनिषद कहते हैं: “जो सबमें है और ...