सहज बोध
प्रकृति में सब कुछ सहजता से हो रहा है जब हम प्रकृति को ध्यान से देखते हैं, तो एक अद्भुत सत्य प्रकट होता है— प्रकृति में कहीं भी तनाव नहीं है, केवल सहजता है। सूरज बिना किसी प्रयास के प्रतिदिन उदय होता है। चंद्रमा अपनी गति से चलता है। नदियाँ बिना शिकायत के बहती हैं। वृक्ष बिना किसी अहंकार के फल देते हैं। फूल बिना किसी अपेक्षा के खिलते हैं। पक्षी बिना भविष्य की चिंता के गीत गाते हैं। प्रकृति हमें सिखाती है कि जीवन का स्वभाव संघर्ष नहीं, सहजता है। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसने अपने मन में असंख्य कल्पनाएँ, भय, अपेक्षाएँ और मान्यताएँ इकट्ठी कर ली हैं। इन्हीं के कारण वह उस जीवन से लड़ने लगता है जो पहले से ही सहज रूप से घटित हो रहा है। वह चाहता है कि सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार हो, और जब ऐसा नहीं होता तो दुःख, क्रोध, भय और तनाव जन्म लेते हैं। सत्य यह है कि जीवन हमारे नियंत्रण से नहीं, बल्कि एक व्यापक व्यवस्था से संचालित हो रहा है। हमारा हृदय धड़क रहा है, श्वास चल रही है, भोजन पच रहा है, कोशिकाएँ बन रही हैं—इनमें से कोई भी कार्य हम अपनी इच्छा से नहीं कर रहे। फिर भी सब कुछ निरंतर हो रहा...