सत्य समझ
मैं शरीर, मन और बुद्धि नहीं हूँ — सत्य की पहचान ही मुक्ति है मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा भ्रम यह नहीं है कि संसार वास्तविक है या अवास्तविक। सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को शरीर, मन और बुद्धि मान बैठा है। यही भ्रम समस्त दुःख, भय, तनाव, मोह और बंधन का मूल कारण है। जन्म के बाद से ही हमें बार-बार बताया जाता है—"यह तुम्हारा शरीर है", "तुम्हारा नाम यही है", "तुम्हारे विचार यही हैं", "तुम्हारी सफलता और असफलता यही है।" धीरे-धीरे यह शिक्षा इतनी गहरी हो जाती है कि हम इसे सत्य मान लेते हैं। परंतु क्या यह वास्तव में सत्य है? शरीर बदलता है, पर 'मैं' नहीं बचपन का शरीर अलग था। युवावस्था का शरीर अलग हुआ। बुढ़ापे का शरीर फिर बदल गया। शरीर की प्रत्येक कोशिका समय के साथ बदलती रहती है। विज्ञान भी स्वीकार करता है कि शरीर निरंतर परिवर्तनशील है। यदि शरीर बदलता रहता है, तो वह कौन है जो इन सभी परिवर्तनों को जान रहा है? वह 'जानने वाला' शरीर नहीं हो सकता। मन भी 'मैं' नहीं एक क्षण मन प्रसन्न होता है। दूसरे क्षण उदास। कभी क्रोधित, कभी...