स्वयं की पहचान
क्या आप जानते हो कि आप कौन है? अधिकांश मनुष्य स्वयं को सही रूप में नहीं पहचान पाता। वह अपने शरीर, नाम, संबंध, विचार, स्मृतियों, उपलब्धियों और भूमिकाओं को ही “मैं” मान लेता है। जबकि ये सब बदलते रहते हैं। बचपन का शरीर बदल गया विचार बदल गए मान्यताएँ बदल गईं रिश्ते और परिस्थितियाँ बदल गईं फिर भी भीतर कुछ ऐसा है जो हर परिवर्तन को देख रहा है। वही वास्तविक “मैं” है — साक्षी चेतना। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह: जो दिखाई देता है उसे स्वयं मान लेता है, और जो वास्तव में स्वयं है उसे भूल जाता है। इसलिए व्यक्ति कहता है: “मैं दुखी हूँ” “मैं असफल हूँ” “मैं श्रेष्ठ हूँ” “मैं कमजोर हूँ” जबकि ये सब मन की अवस्थाएँ हैं, स्वयं का सत्य नहीं। आत्मपहचान तब प्रारम्भ होती है जब व्यक्ति भीतर पूछता है: मैं वास्तव में कौन हूँ? क्या मैं केवल शरीर हूँ? क्या विचार आने-जाने से “मैं” बदल जाता हूँ? जो सबको देख रहा है, वह कौन है? यहीं से जागरण प्रारम्भ होता है। भारतीय अद्वैत परंपरा में इसे “स्वबोध” कहा गया है — स्वयं को जानना। अष्टावक्र गीता और भगवद्गीता में भी यही संकेत है कि मनुष्य का मूल स्वरूप शुद...