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दड़बे की मुर्गी

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💐 दड़बे की मुर्गी! 💐 मान्यताओं के पिंजरे से बाहर निकलने का साहस एक दिन एक शिष्य अपने गुरु के पास पहुँचा और पूछा— “गुरुदेव, लोगों को वास्तव में खुश रहने के लिए क्या चाहिए?” गुरु ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा— “तुम्हें क्या लगता है?” शिष्य कुछ देर सोचकर बोला— “गुरुदेव, मेरा मानना है कि यदि किसी व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी हो रही हों— उसे पर्याप्त भोजन मिले, रहने के लिए घर हो, कोई अच्छा काम या नौकरी हो, आर्थिक सुरक्षा हो और जीवन में सुविधाएँ हों—तो वह खुश रह सकता है।” गुरु कुछ नहीं बोले। उन्होंने शिष्य को अपने साथ चलने का संकेत किया। दोनों कुछ दूर चले और एक दरवाजे के सामने जाकर गुरु रुके। उन्होंने कहा— “यह दरवाजा खोलो।” शिष्य ने दरवाजा खोला। सामने एक बड़ा-सा मुर्गीखाना था। उसमें बहुत-सी मुर्गियाँ और चूजे अलग-अलग पिंजरों में बंद थे। शिष्य ने आश्चर्य से पूछा— “गुरुदेव, आप मुझे यह क्यों दिखा रहे हैं?” गुरु ने कहा— “पहले इनसे कुछ प्रश्न पूछो।” फिर गुरु स्वयं प्रश्न करने लगे— “क्या इन्हें भोजन मिलता है?” शिष्य बोला— “हाँ।” “क्या इनके पास रहने के लिए जगह है?” “हाँ।”...

आपके विचार आपका संसार

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तितली की सोच या गुबरैला की सोच? जीवन में परिस्थितियाँ सभी के सामने आती हैं, लेकिन हर व्यक्ति उन्हें देखने का अपना अलग दृष्टिकोण रखता है। यही दृष्टिकोण तय करता है कि हमें संसार में सौंदर्य दिखाई देगा या केवल गंदगी। एक सुंदर फूल पर बैठी तितली को देखिए। वह फूलों से रस लेती है, रंगों का आनंद लेती है और एक फूल से दूसरे फूल तक उड़ती रहती है। उसके लिए संसार में आकर्षण, सुगंध और संभावनाएँ हैं। दूसरी ओर, गुबरैला उसी संसार में गंदगी और सड़न खोज लेता है। वह जहाँ जाता है, उसे अपनी रुचि के अनुरूप वही दिखाई देता है। प्रश्न यह नहीं है कि संसार में फूल अधिक हैं या गंदगी। प्रश्न यह है कि हमारी दृष्टि किसे खोज रही है। मनुष्य की सोच भी कुछ ऐसी ही होती है। कुछ लोग हर परिस्थिति में कमी, दोष, आलोचना और समस्या खोज लेते हैं। उन्हें अच्छी बात में भी बुराई दिखाई देती है। वे दूसरों की सफलता में भी अपना नुकसान देखते हैं। वहीं कुछ लोग कठिन परिस्थितियों में भी कोई सीख, कोई अवसर और कोई सकारात्मक संभावना खोज लेते हैं। वे समस्याओं से आँखें नहीं चुराते, लेकिन समस्या के भीतर छिपे समाधान को भी देखने की कोशिश ...

जीवन प्रवाह

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हर विचार आपके जीवन का एक बीज है         हमारे जीवन में आने वाला प्रत्येक विचार केवल मन में उठने वाली एक लहर नहीं है, बल्कि वह हमारे जीवन का एक बीज है। जिस प्रकार एक छोटा-सा बीज समय के साथ विशाल वृक्ष बन सकता है, उसी प्रकार हमारे विचार, भावनाएँ और विश्वास धीरे-धीरे हमारे अनुभवों, व्यवहार और जीवन की दिशा को आकार देते हैं। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि हम अपने भीतर कौन-से विचार बो रहे हैं।        यदि हमारे विचार भय, कमी, असुरक्षा और निराशा से भरे हैं, तो हमारा मन उसी प्रकार के अनुभवों को आकर्षित और मजबूत करने लगता है। इसके विपरीत, यदि हम स्वतंत्रता, प्रेम, शांति, विश्वास और दिव्यता का अनुभव करते हैं, तो हमारे भीतर एक नई चेतना जागने लगती है। इसलिए प्रतिदिन कुछ क्षण रुककर स्वयं से कहें— “I am FREE. मैं स्वतंत्र हूँ।” इसका अर्थ है कि मैं अपने पुराने भय, सीमित धारणाओं और मानसिक बंधनों से स्वयं को मुक्त कर रहा हूँ। फिर अनुभव करें— “I am DIVINE. मैं दिव्य हूँ।” इसका अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि यह पहचान है कि मेरे भीतर चेतना, प्रेम, बुद्धि और सृजन की एक गहरी शक्त...

परिवर्तन और स्थिरता

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*परिवर्तन और स्थिरता* सब कुछ बदल रहा है— ऋतुएँ, रिश्ते, रास्ते, आज की हँसी, कल की उदासी, और समय के साथ हमारे अपने चेहरे भी। जो कल अपना था, आज पराया हो जाता है, जो आज मिला है, कल स्मृति बन जाता है। जीवन निरंतर बहता है— जैसे नदी, जो कभी एक क्षण को भी ठहरती नहीं। पर इस परिवर्तन के बीच कुछ ऐसा भी है जो कभी नहीं बदलता। विचार बदलते हैं, पर साक्षी नहीं बदलता। शरीर बदलता है, पर चेतना नहीं बदलती। भावनाएँ आती-जाती हैं, पर भीतर की शांति अपनी जगह बनी रहती है। बाहर संसार में हर पल परिवर्तन है, और भीतर कहीं एक मौन आकाश है न जन्मता है, न मिटता है, न आता है, न जाता है। शायद जीवन का रहस्य यही है— परिवर्तन को रोकना नहीं, बल्कि उस स्थिरता को पहचानना जो परिवर्तन को देख रही है। पत्ते गिरते रहें, ऋतुएँ बदलती रहें, लोग आते-जाते रहें, समय अपनी गति से चलता रहे— मैं उस मौन में ठहरूँ, जहाँ कुछ बदलता नहीं। सब बदल रहा है, पर जो सबके बदलने को देख रहा है— वही मेरा सत्य है। और उसी सत्य में शाश्वत स्थिरता है। 🌹

जब संसार बिक गया

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जब संसार बिक गया एक ऐसी कहानी, जो हमें अपने भीतर के निर्णयकर्ता से मिलाती है कहा जाता है कि संसार को नष्ट करने के लिए हमेशा युद्ध की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी कुछ लोग केवल इतना करते हैं कि सत्य को कमजोर, भय को शक्तिशाली और अच्छे लोगों को मौन कर देते हैं। बहुत समय पहले पृथ्वी पर एक सुंदर संसार था। लोग अलग-अलग देशों में रहते थे, उनकी भाषाएँ अलग थीं, संस्कृतियाँ अलग थीं, विचार अलग थे—लेकिन मनुष्य होने के नाते उनमें एक चीज समान थी— वे सुख चाहते थे। वे सम्मान चाहते थे। वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षित भविष्य चाहते थे। और सबसे बढ़कर—वे स्वतंत्र होकर जीना चाहते थे। फिर एक दिन कुछ स्वार्थी और निर्दयी लोगों का एक समूह सामने आया। उनके पास धन था, चालाकी थी और सत्ता पाने की तीव्र इच्छा थी। उन्होंने संसार को तलवार से जीतने की कोशिश नहीं की। उन्होंने उससे भी खतरनाक रास्ता चुना— उन्होंने लोगों की आवश्यकताओं पर अधिकार करना शुरू किया। उन्होंने धन पर नियंत्रण किया। फिर व्यापार पर। फिर सूचनाओं पर। फिर व्यवस्थाओं पर। फिर निर्णयों पर। जो उनकी बात मानता, उसे आगे बढ़ाया जाता। जो प्रश्न करता, उसे ...

सत्य समझ

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मैं शरीर, मन और बुद्धि नहीं हूँ —  सत्य की पहचान ही मुक्ति है मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा भ्रम यह नहीं है कि संसार वास्तविक है या अवास्तविक। सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को शरीर, मन और बुद्धि मान बैठा है। यही भ्रम समस्त दुःख, भय, तनाव, मोह और बंधन का मूल कारण है। जन्म के बाद से ही हमें बार-बार बताया जाता है—"यह तुम्हारा शरीर है", "तुम्हारा नाम यही है", "तुम्हारे विचार यही हैं", "तुम्हारी सफलता और असफलता यही है।" धीरे-धीरे यह शिक्षा इतनी गहरी हो जाती है कि हम इसे सत्य मान लेते हैं। परंतु क्या यह वास्तव में सत्य है? शरीर बदलता है, पर 'मैं' नहीं बचपन का शरीर अलग था। युवावस्था का शरीर अलग हुआ। बुढ़ापे का शरीर फिर बदल गया। शरीर की प्रत्येक कोशिका समय के साथ बदलती रहती है। विज्ञान भी स्वीकार करता है कि शरीर निरंतर परिवर्तनशील है। यदि शरीर बदलता रहता है, तो वह कौन है जो इन सभी परिवर्तनों को जान रहा है? वह 'जानने वाला' शरीर नहीं हो सकता। मन भी 'मैं' नहीं एक क्षण मन प्रसन्न होता है। दूसरे क्षण उदास। कभी क्रोधित, कभी...

कृष्ण जी का अद्भुत ज्ञान

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हर कर्म को ईश्वर को समर्पित करें – आत्मबोध का सहज मार्ग श्रीकृष्ण भगवद्गीता में बताते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है, न कभी मरती है। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और दोषरहित है। हमारे जीवन के अधिकांश दुःख इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि हम स्वयं को केवल शरीर और मन मान लेते हैं तथा प्रत्येक कर्म का कर्ता भी स्वयं को ही समझते हैं। गीता का एक अत्यंत सरल और गहन संदेश है— अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित कर दो। जब भी कोई कार्य करें, भीतर यह भाव रखें— मैं स्नान करने जा रहा हूँ — ईश्वर की कृपा से यह स्नान हो रहा है। मैं भोजन कर रहा हूँ — ईश्वर की कृपा से यह भोजन ग्रहण हो रहा है। मैं चल रहा हूँ — ईश्वर की शक्ति से यह चलना हो रहा है। मैं बोल रहा हूँ — ईश्वर की प्रेरणा से यह वाणी प्रवाहित हो रही है। मैं सोने जा रहा हूँ — ईश्वर की गोद में विश्राम हो रहा है। मैं जागा हूँ — ईश्वर की कृपा से एक नया दिन मिला है। मेरा हर अनुभव सुख या दुःख ईश्वर ही कर रहा है।  धीरे-धीरे स्व अनुभव गहरा होने लगता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण उसी परम चेतना की कृपा से घटित हो रहा है। तब अहंकार शिथिल होने ...