मन और भावना के साथ कैसे रहें?

मन पर भरोसा कितना करें?

मनुष्य मन पर उतना ही भरोसा कर सकता है
जितना आकाश में बदलते बादलों पर।
मन का स्वभाव ही परिवर्तन है।
वह हर क्षण बदलता है —
कभी प्रसन्न, कभी उदास,
कभी साहसी, कभी भयभीत,
कभी प्रेम में, कभी क्रोध में।

मन एक अद्भुत उपकरण है,
लेकिन स्थायी सत्य नहीं।
इसलिए ऋषियों ने कहा —
“मन अच्छा सेवक है, परंतु अच्छा मालिक नहीं।”

मन निरंतर “कलाबाजी” इसलिए करता है क्योंकि वह:

स्मृतियों से चलता है,
इच्छाओं से प्रभावित होता है,
भय और आशाओं के बीच झूलता रहता है,
और बाहरी परिस्थितियों से तुरंत प्रभावित हो जाता है।

यदि मन पर पूर्ण भरोसा कर लिया जाए,
तो जीवन अस्थिर हो सकता है।
क्योंकि आज जो मन कह रहा है,
कल वही उसका उल्टा भी कह सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि मन शत्रु है।
मन का उपयोग करना है,
उसमें खोना नहीं है।

जैसे:

वाहन उपयोगी है, पर चालक नहीं बन सकता।
कंपास दिशा दिखा सकता है, पर अंतिम निर्णय यात्री का होता है।
मन को देखने वाला जो “साक्षी” है,
वही वास्तविक भरोसे योग्य है।
क्योंकि:
विचार बदलते हैं,
भावनाएँ बदलती हैं,
मनःस्थितियाँ बदलती हैं, पर जो इन सबको देख रहा है,
वह नहीं बदलता।

ध्यान का सार भी यही है —
मन को रोकना नहीं,
बल्कि यह जानना कि
“मैं मन नहीं हूँ।”

जब यह समझ गहरी होती है,
तब मन की कलाबाजियाँ भी एक खेल जैसी लगने लगती हैं।
फिर मन का उपयोग होता है,
लेकिन जीवन का केंद्र “होश” बन जाता है।

एक छोटी सी बात मनन के लिए:

> “मन मौसम की तरह बदलता है,
पर आपका अस्तित्व आकाश की तरह स्थिर है।”
सत्य महेश 
23.05.2026

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