दोष देखने के कला
दोषदर्शी महात्मा
कुछ लोग इस पृथ्वी पर एक विशेष मिशन लेकर आते हैं—दोष खोजने का मिशन।
यदि भगवान भी स्वयं धरती पर आ जाएँ, तो ये विनम्रता से कहेंगे—
"प्रभु! बाकी सब ठीक है, लेकिन आपकी योजना में कुछ सुधार की आवश्यकता है।"
इनकी दृष्टि अद्भुत होती है।
जहाँ साधारण मनुष्य फूल देखता है, वहाँ ये काँटे गिनते हैं।
जहाँ कोई प्रेम देखता है, वहाँ ये स्वार्थ खोज लेते हैं।
जहाँ कोई प्रयास देखता है, वहाँ ये केवल कमियाँ ढूँढ़ लेते हैं।
यदि किसी ने सौ लोगों का भला किया हो और एक छोटी-सी भूल हो जाए, तो इनका कैमरा उसी भूल पर ज़ूम कर देता है।
मानो संसार में अच्छाई का कोई मूल्य ही नहीं।
ऐसे लोग घर में हों तो परिवार अशांत रहता है।
कार्यालय में हों तो सहयोग कठिन हो जाता है।
समाज में हों तो विभाजन बढ़ता है।
और यदि यही वृत्ति अपने ही मन की ओर मुड़ जाए, तो व्यक्ति स्वयं से भी कभी संतुष्ट नहीं रह पाता।
वास्तव में दोष देखने की आदत, दूसरों से अधिक देखने वाले को ही कष्ट देती है।
क्योंकि संसार वैसा नहीं दिखता जैसा वह है, बल्कि वैसा दिखता है जैसा हमारा मन है।
यदि मन में शिकायत भरी हो, तो चाँद में भी दाग ही दिखाई देंगे।
यदि मन में प्रेम हो, तो मिट्टी में भी भगवान के चरणचिह्न दिखाई देने लगते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि गलत को सही मान लिया जाए।
विवेक आवश्यक है, पर दोषदृष्टि और विवेक में उतना ही अंतर है जितना मक्खी और मधुमक्खी में।
मक्खी पूरे बगीचे में घूमकर घाव ढूँढ़ती है।
मधुमक्खी उसी बगीचे में जाकर केवल फूलों का रस लेती है।
प्रश्न यह नहीं कि संसार में दोष हैं या नहीं।
प्रश्न यह है कि हमारा मन किसकी खोज में निकला है—दोष की या गुण की?
जो केवल दोष देखता है, वह धीरे-धीरे स्वयं दोषों का घर बन जाता है।
जो गुण देखता है, उसके भीतर भी गुणों का विकास होने लगता है।
इसलिए आज से एक छोटा-सा प्रयोग करें—
हर व्यक्ति या स्थिति में कम-से-कम एक गुण अवश्य खोजें।
संभव है, संसार अचानक पहले से अधिक सुंदर दिखाई देने लगे।
याद रखिए—
दोष देखना बुद्धि का खेल हो सकता है, पर गुण देखना हृदय की परिपक्वता है।
और जो हृदय परिपक्व हो जाता है, वही जीवन में शांति, प्रेम और आनंद का वास्तविक अनुभव करता है।
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