जब संसार बिक गया
जब संसार बिक गया एक ऐसी कहानी, जो हमें अपने भीतर के निर्णयकर्ता से मिलाती है कहा जाता है कि संसार को नष्ट करने के लिए हमेशा युद्ध की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी कुछ लोग केवल इतना करते हैं कि सत्य को कमजोर, भय को शक्तिशाली और अच्छे लोगों को मौन कर देते हैं। बहुत समय पहले पृथ्वी पर एक सुंदर संसार था। लोग अलग-अलग देशों में रहते थे, उनकी भाषाएँ अलग थीं, संस्कृतियाँ अलग थीं, विचार अलग थे—लेकिन मनुष्य होने के नाते उनमें एक चीज समान थी— वे सुख चाहते थे। वे सम्मान चाहते थे। वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षित भविष्य चाहते थे। और सबसे बढ़कर—वे स्वतंत्र होकर जीना चाहते थे। फिर एक दिन कुछ स्वार्थी और निर्दयी लोगों का एक समूह सामने आया। उनके पास धन था, चालाकी थी और सत्ता पाने की तीव्र इच्छा थी। उन्होंने संसार को तलवार से जीतने की कोशिश नहीं की। उन्होंने उससे भी खतरनाक रास्ता चुना— उन्होंने लोगों की आवश्यकताओं पर अधिकार करना शुरू किया। उन्होंने धन पर नियंत्रण किया। फिर व्यापार पर। फिर सूचनाओं पर। फिर व्यवस्थाओं पर। फिर निर्णयों पर। जो उनकी बात मानता, उसे आगे बढ़ाया जाता। जो प्रश्न करता, उसे ...