मै हूँ

✍️🌹 मैं ही मेरी बाधा, मैं ही मेरी मुक्ति

जब तक मैं स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि, नाम और व्यक्तित्व मानता हूँ, तब तक मैं ही अपनी हर बाधा का कारण हूँ। मेरे विचार ही मेरा संसार बनाते हैं, मेरी मान्यताएँ ही मेरे बंधन बन जाती हैं, और मेरा अहंकार ही मेरे दुखों का निर्माता होता है।

अज्ञान में मैं बंधन हूँ।
ज्ञान में मैं स्वतंत्रता हूँ।

मैं ही प्रश्न हूँ, मैं ही उत्तर हूँ।
मैं ही गुरु हूँ, मैं ही शिष्य हूँ।
मैं ही साधक हूँ, मैं ही साधना हूँ।
मैं ही दृष्टा हूँ, मैं ही दृश्य हूँ।
मैं ही यात्रा हूँ, मैं ही मंज़िल हूँ।

किन्तु यह सब केवल तब तक है, जब तक "मैं" अनेक रूपों में विभाजित प्रतीत होता है।

जिस क्षण यह प्रत्यक्ष बोध होता है कि मैं न शरीर हूँ, न मन, न बुद्धि, न अहंकार—मैं तो वह शुद्ध चैतन्य हूँ जिसके प्रकाश में यह सब प्रकट होता है—उसी क्षण समस्त भ्रम समाप्त हो जाता है।

तब न कोई बंधन रहता है, न कोई मुक्त होने वाला।
न कोई साधक, न कोई सिद्ध।
न कोई पाने वाला, न कुछ पाने योग्य।

तब ज्ञात होता है कि जिसे खोज रहा था, वही खोजने वाला था; जिस सत्य को पाना चाहता था, वही मेरा स्वभाव था। खोज समाप्त नहीं होती—खोजने वाला ही विलीन हो जाता है।

फिर केवल मौन शेष रहता है—निर्मल, निर्विकल्प, सहज और पूर्ण।

वहाँ न प्राप्ति है, न त्याग।
न जन्म है, न मृत्यु।
न बंधन है, न मुक्ति।
न द्वैत है, न अद्वैत कहने की भी आवश्यकता।

केवल वही एक सत्य है—जो कभी उत्पन्न नहीं हुआ, कभी नष्ट नहीं होगा; जो सदा से था, अभी है, और सदा रहेगा।

स्वयं को जानना ही परम ज्ञान है।
स्वयं में स्थित होना ही परम शांति है।
स्वयं होना ही मोक्ष है।

❤️🙏 सत्य समझ
– सत्य महेश

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