कृष्ण जी का अद्भुत ज्ञान
हर कर्म को ईश्वर को समर्पित करें – आत्मबोध का सहज मार्ग
श्रीकृष्ण भगवद्गीता में बताते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है, न कभी मरती है। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और दोषरहित है। हमारे जीवन के अधिकांश दुःख इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि हम स्वयं को केवल शरीर और मन मान लेते हैं तथा प्रत्येक कर्म का कर्ता भी स्वयं को ही समझते हैं।
गीता का एक अत्यंत सरल और गहन संदेश है—अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित कर दो।
जब भी कोई कार्य करें, भीतर यह भाव रखें—
- मैं स्नान करने जा रहा हूँ — ईश्वर की कृपा से यह स्नान हो रहा है।
- मैं भोजन कर रहा हूँ — ईश्वर की कृपा से यह भोजन ग्रहण हो रहा है।
- मैं चल रहा हूँ — ईश्वर की शक्ति से यह चलना हो रहा है।
- मैं बोल रहा हूँ — ईश्वर की प्रेरणा से यह वाणी प्रवाहित हो रही है।
- मैं सोने जा रहा हूँ — ईश्वर की गोद में विश्राम हो रहा है।
- मैं जागा हूँ — ईश्वर की कृपा से एक नया दिन मिला है।
- मेरा हर अनुभव सुख या दुःख ईश्वर ही कर रहा है।
धीरे-धीरे स्व अनुभव गहरा होने लगता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण उसी परम चेतना की कृपा से घटित हो रहा है। तब अहंकार शिथिल होने लगता है, कर्तापन का बोझ हल्का हो जाता है और मन में शांति, सहजता तथा समर्पण का भाव विकसित होता है। और यह ज्ञान प्रकट होता है कि मैं ईश्वर से भिन्न कुछ नहीं है।
यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि इसका अर्थ अपनी जिम्मेदारियों से भागना नहीं है।
गीता का संदेश है—कर्म पूरी निष्ठा से करो, पर उसके अहंकार और फल की आसक्ति को ईश्वर को समर्पित कर दो।
जब जीवन का प्रत्येक कार्य पूजा बन जाता है और प्रत्येक श्वास कृतज्ञता से भर जाती है, तब आत्मबोध की दिशा में यात्रा सहज होने लगती है।
"मैं नहीं, प्रभु की कृपा से सब हो रहा है।"
यही भावना मन को हल्का करती है, अहंकार को गलाती है और आत्मस्वरूप की ओर ले जाने वाला एक सरल एवं प्रभावी साधन बन सकती है।
सत्य महेश,
भोपाल
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