सत्य समझ

मैं शरीर, मन और बुद्धि नहीं हूँ — 
सत्य की पहचान ही मुक्ति है

मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा भ्रम यह नहीं है कि संसार वास्तविक है या अवास्तविक। सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को शरीर, मन और बुद्धि मान बैठा है। यही भ्रम समस्त दुःख, भय, तनाव, मोह और बंधन का मूल कारण है।

जन्म के बाद से ही हमें बार-बार बताया जाता है—"यह तुम्हारा शरीर है", "तुम्हारा नाम यही है", "तुम्हारे विचार यही हैं", "तुम्हारी सफलता और असफलता यही है।" धीरे-धीरे यह शिक्षा इतनी गहरी हो जाती है कि हम इसे सत्य मान लेते हैं। परंतु क्या यह वास्तव में सत्य है?

शरीर बदलता है, पर 'मैं' नहीं

बचपन का शरीर अलग था।

युवावस्था का शरीर अलग हुआ।

बुढ़ापे का शरीर फिर बदल गया।

शरीर की प्रत्येक कोशिका समय के साथ बदलती रहती है। विज्ञान भी स्वीकार करता है कि शरीर निरंतर परिवर्तनशील है।

यदि शरीर बदलता रहता है, तो वह कौन है जो इन सभी परिवर्तनों को जान रहा है?

वह 'जानने वाला' शरीर नहीं हो सकता।

मन भी 'मैं' नहीं

एक क्षण मन प्रसन्न होता है।

दूसरे क्षण उदास।

कभी क्रोधित, कभी शांत।

यदि मन ही मैं होता, तो मैं हर क्षण बदल जाता।

लेकिन एक साक्षी है जो मन के सभी उतार-चढ़ाव को देख रहा है।

जो मन को देख सकता है, वह मन नहीं हो सकता।

बुद्धि भी 'मैं' नहीं

बुद्धि निर्णय लेती है।

कभी सही निर्णय।

कभी गलत निर्णय।

ज्ञान बढ़ता है, विचार बदलते हैं, मान्यताएँ बदलती हैं।

जो बुद्धि के बदलते निर्णयों को जानता है, वह बुद्धि भी नहीं हो सकता।

फिर 'मैं' कौन हूँ?

यही आत्मबोध का प्रश्न है।

वेदांत कहता है—

"तुम शरीर नहीं हो।"

"तुम मन नहीं हो।"

"तुम बुद्धि नहीं हो।"

तुम वह शुद्ध चेतना हो, जिसके प्रकाश में शरीर चलता है, मन सोचता है और बुद्धि निर्णय करती है।

जैसे बिजली के बिना बल्ब प्रकाश नहीं दे सकता, वैसे ही चेतना के बिना शरीर, मन और बुद्धि कार्य नहीं कर सकते।

मान्यता ही बंधन है

बंधन वास्तव में शरीर में नहीं है।

बंधन मन में भी नहीं है।

बंधन केवल एक गलत मान्यता में है—

"मैं शरीर हूँ।"

इसी मान्यता से भय उत्पन्न होता है।

शरीर नष्ट होगा—इसलिए मृत्यु का भय।

मन आहत होगा—इसलिए अपमान का भय।

बुद्धि हार जाएगी—इसलिए असफलता का भय।

यदि 'मैं' इन तीनों से अलग हूँ, तो भय किसका?

सत्य समझ क्या है?

सत्य समझ का अर्थ कोई नया विचार स्वीकार करना नहीं है।

सत्य समझ का अर्थ है—

जो असत्य है उसे पहचानकर छोड़ देना।

जब स्पष्ट हो जाता है कि—

शरीर मेरा उपकरण है।

मन मेरा माध्यम है।

बुद्धि मेरा साधन है।

तब सहज ही अनुभव होता है—

मैं इन सबका साक्षी हूँ।

यहीं से मुक्ति प्रारंभ होती है।

मुक्ति कोई भविष्य की घटना नहीं

बहुत से लोग सोचते हैं कि मृत्यु के बाद मुक्ति मिलेगी।

परंतु वास्तविक मुक्ति अभी और यहीं संभव है।

जिस क्षण "मैं शरीर हूँ" की मान्यता समाप्त होती है, उसी क्षण बंधन ढीला पड़ने लगता है।

शरीर अपना कार्य करता रहता है।

मन अपने विचार लाता रहता है।

बुद्धि निर्णय लेती रहती है।

पर भीतर जानने वाला शांत रहता है।

यही जीवन्मुक्ति है।

जीवन में क्या परिवर्तन आता है?

जब व्यक्ति स्वयं को शुद्ध चेतना के रूप में पहचानता है, तब—

भय कम होने लगता है।

क्रोध घटने लगता है।

अपेक्षाएँ कम हो जाती हैं।

मृत्यु का आतंक कम हो जाता है।

प्रेम सहज हो जाता है।

सेवा स्वाभाविक हो जाती है।

जीवन एक लीला जैसा प्रतीत होने लगता है।

वह संसार से भागता नहीं, बल्कि संसार में रहकर भी उससे बंधता नहीं।

निष्कर्ष

मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन संसार नहीं, बल्कि स्वयं के बारे में बनी हुई गलत मान्यता है।

"मैं शरीर हूँ"—यही अज्ञान है।

"मैं शुद्ध चेतना हूँ"—यही सत्य है।

जब सत्य का प्रत्यक्ष बोध होता है, तब शरीर, मन और बुद्धि अपना कार्य करते रहते हैं, पर व्यक्ति उनसे अपनी पहचान नहीं जोड़ता।

यही आत्मज्ञान है।

यही वास्तविक स्वतंत्रता है।

यही शांति है।

अंतिम सूत्र

> "शरीर मेरा है, पर मैं शरीर नहीं।
मन मेरा है, पर मैं मन नहीं।
बुद्धि मेरी है, पर मैं बुद्धि नहीं।
मैं वह शुद्ध, साक्षी चेतना हूँ जो इन सबको प्रकाशित करती है।"

– सत्य महेश

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