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जीवन चक्र: जन्म से मृत्यु तक

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जीवन चक्र: जन्म से मृत्यु तक – एक सफल मानवीय यात्रा प्रस्तावना जीवन एक निरंतर प्रवाह है – जन्म से लेकर मृत्यु तक। यह केवल शारीरिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मिक और मानसिक विकास की यात्रा भी है। एक सफल जीवन वही कहलाता है जिसमें मानव अपनी संभावनाओं को पहचाने, कर्तव्यपथ पर चले, और अंततः संतोष व शांति की स्थिति में पहुँचे। इस लेख में हम जानेंगे कि जीवन के विभिन्न चरणों में क्या करना चाहिए ताकि यह यात्रा सार्थक, सफल और आत्मिक दृष्टि से समृद्ध हो। 1. बाल्यावस्था (0 से 12 वर्ष) – नींव की अवस्था विकास का समय : यह समय शारीरिक, मानसिक व नैतिक आधार डालने का होता है। अभिभावकों की भूमिका : इस अवस्था में बच्चे के मन में संस्कारों का बीजारोपण करना चाहिए – जैसे कि सत्य, करुणा, अनुशासन, श्रम और आत्मविश्वास। खेल और शिक्षा : खेल के माध्यम से स्वास्थ्य और अध्ययन के माध्यम से विचारशीलता का विकास करें। मंत्र : "जैसा बीज बोओगे, वैसा ही वृक्ष पाओगे।" 2. किशोरावस्था (13 से 19 वर्ष) – दिशा निर्धारण की अवस्था आत्म-साक्षात्कार का प्रारंभ : यह काल आत्म-पहचान का होता है। युवा अपने भ...

मैं कौन हूँ?

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मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ? यह प्रश्न उठा, मन का अंतरतम जागा। नहीं शरीर,न विचार, कभी लगता, मैं एक प्रकार। कभी लगा, मैं धड़कन मात्र, कभी हवा संग उड़ता पात। कभी लगा, यह जगत भ्रम है, कभी लगा, मैं इसमें रम हूँ। धूप-छाँव का खेल निराला, कभी सागर, कभी ज्वाला। कभी शून्य, कभी विस्तार, कभी प्रेम, कभी तकरार। मैं रूप-अरूप से परे खड़ा, हर प्रश्न का उत्तर बड़ा। ना मैं यह तन, ना मैं यह मन, ना वासनाएँ, ना ही चिंतन। मैं शाश्वत चेतना प्रवाहित, अद्वैत प्रेम से आलोकित। ना आदि मेरा, ना है अंत, बस हूँ साक्षी, चिर-अनंत। जो इसे समझे, मुक्त वही, जो इसमें उलझे, भ्रम वही। मैं तो बस अनुभव मात्र हूँ, अहंकार से परे सत्य ब्रह्म हूँ। मैं वही हूँ।