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आत्मबोध

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### आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित आत्मबोध का सार **आत्मबोध** आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित एक प्रमुख प्रकरण ग्रंथ है, जिसमें 68 श्लोकों के माध्यम से अद्वैत वेदांत के मूल सिद्धांतों को सरलता से समझाया गया है। यह ग्रंथ उन साधकों के लिए लिखा गया है जो तपस्या से पापों से शुद्ध हो चुके हैं, शांतचित्त हैं, राग-द्वेष से मुक्त हैं और मुक्ति की इच्छा रखते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य आत्मज्ञान के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाना है। #### मुख्य शिक्षाएँ और सारांश: 1. **ज्ञान ही मुक्ति का साधन है**:      कर्म, उपासना या भक्ति से अज्ञान का नाश नहीं होता। केवल आत्मज्ञान (विवेकपूर्ण ज्ञान) ही अज्ञान को दूर कर मुक्ति प्रदान करता है, जैसे अंधकार को प्रकाश ही नष्ट करता है। अन्य साधन (कर्म आदि) अप्रत्यक्ष रूप से सहायक हैं, लेकिन प्रत्यक्ष मुक्ति ज्ञान से ही होती है। 2. **आत्मा का स्वरूप**:      आत्मा शुद्ध चैतन्य स्वरूप है – सत् (सदा विद्यमान), चित् (चेतना) और आनंद (पूर्ण सुख)। यह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और अविभाज्य है। आत्मा शरीर, इंद्रियाँ, ...

एक कुश्ती जो याद रहे

यह कहावत — “मूर्ख को समझाना सूअर से कुश्ती लड़ने के समान होता है” — सिर्फ़ कटाक्ष नहीं है, बल्कि मानव मनोविज्ञान और व्यवहार की एक गहरी सच्चाई को उजागर करती है। आइए इसे गहराई से, उदाहरणों और जीवन-दृष्टि के साथ समझते हैं। 1️⃣ कहावत का प्रतीकात्मक अर्थ सूअर से कुश्ती कुश्ती में दोनों कीचड़ में उतरते हैं। कुछ देर बाद दोनों गंदे हो जाते हैं, लेकिन सूअर को कोई फर्क नहीं पड़ता, जबकि आप अपनी गरिमा खो बैठते हैं। मूर्ख व्यक्ति से बहस मूर्ख तर्क, तथ्य, अनुभव या सत्य को स्वीकार नहीं करता। वह केवल अपने अहं, जिद और पूर्वाग्रह से संचालित होता है। ➡️ परिणाम यह होता है कि आप थक जाते हैं, मानसिक ऊर्जा खोते हैं, लेकिन उस व्यक्ति में कोई परिवर्तन नहीं आता। 2️⃣ मूर्ख को समझाने में क्यों विफलता मिलती है? 🔹 (क) सुनने की क्षमता का अभाव मूर्ख व्यक्ति: सुनता नहीं, केवल जवाब देने की तैयारी करता है बात को समझने नहीं, जीतने आता है 🔹 (ख) अहंकार की दीवार उसका अहं इतना मजबूत होता है कि: उसे सच से नहीं, अपने सही होने से प्रेम होता है यदि सच मान लिया, तो उसका अहं टूट जाएगा 🔹 (ग) तर्क का अभाव तर्क के बिना संवाद: शोर ...